अपने बयानों के कारण बार-बार विवादों में घिरे कैलाश विजयवर्गीय
- Lucky Kumar
- 4 days ago
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भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कद्दावर नेता और मध्य प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय एक बार फिर अपने बयान को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला इंदौर में हुई एक दुखद घटना से जुड़ा है, जहाँ दूषित पानी के कारण कई लोगों की मौत हो गई। घटना को लेकर जब एक न्यूज रिपोर्टर ने उनसे सवाल किया, तो मंत्री द्वारा दिया गया जवाब न केवल असंवेदनशील माना गया, बल्कि पत्रकारिता की गरिमा पर भी सवाल खड़े कर गया।
यह पहली बार नहीं है जब कैलाश विजयवर्गीय अपने काम से ज्यादा अपने “बेलगाम बयानों” के कारण चर्चा में आए हों। बीते वर्षों में उनके कई बयान विवादों का कारण बने हैं, जिनकी वजह से विपक्ष ही नहीं, बल्कि कई बार उनकी ही पार्टी को सफाई देनी पड़ी है।
इंदौर की घटना और ताजा विवाद
इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों को लेकर प्रदेश में राजनीतिक माहौल पहले ही गर्म था। इसी बीच एक रिपोर्टर द्वारा जिम्मेदारी और प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल पूछे जाने पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कथित तौर पर जिस लहजे में जवाब दिया, उसने नई बहस को जन्म दे दिया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद विपक्ष ने इसे “अहंकारी रवैया” करार दिया और कहा कि सत्ता में बैठे नेताओं को जनता के सवालों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, न कि पत्रकारों को अपमानित करना चाहिए।
बयान जो पहले भी विवादों में रहे
कैलाश विजयवर्गीय का नाम उन नेताओं में शुमार है, जिनके बयान अक्सर सुर्खियाँ बन जाते हैं। कभी महिलाओं के पहनावे को लेकर टिप्पणी, तो कभी फिल्मी कलाकारों या सामाजिक वर्गों पर की गई टिप्पणी—ऐसे कई मौके रहे हैं जब उनके शब्दों ने राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी।
इन बयानों को लेकर विपक्ष लगातार उन्हें निशाने पर लेता रहा है। कांग्रेस समेत अन्य दलों का आरोप है कि इस तरह की टिप्पणियाँ भाजपा की असली सोच को उजागर करती हैं, जबकि भाजपा अक्सर इन्हें “व्यक्तिगत बयान” बताकर पल्ला झाड़ती नजर आती है।
पार्टी के भीतर भी असहजता
हालांकि कैलाश विजयवर्गीय भाजपा के वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं, लेकिन उनके बयानों से कई बार पार्टी को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा है। चुनावी मौसम में या संवेदनशील मुद्दों पर दिए गए बयान पार्टी की रणनीति को नुकसान पहुँचा सकते हैं—यह बात राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं।
कई मौकों पर भाजपा नेतृत्व को उनके बयान पर सफाई देनी पड़ी है या यह कहना पड़ा है कि पार्टी ऐसे विचारों से सहमत नहीं है। इसके बावजूद विवादों का सिलसिला थमता नजर नहीं आता।
काम बनाम बयान की राजनीति
कैलाश विजयवर्गीय लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं और संगठनात्मक क्षमता के लिए जाने जाते रहे हैं। मध्य प्रदेश में भाजपा संगठन को मजबूत करने में उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन मौजूदा समय में उनकी पहचान उनके प्रशासनिक कामों से ज्यादा विवादास्पद बयानों से जुड़ती जा रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आज के डिजिटल दौर में हर बयान तुरंत वायरल हो जाता है, और ऐसे में नेताओं की भाषा और संवेदनशीलता पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। जनता अब सिर्फ काम ही नहीं, व्यवहार और जवाबदेही भी देखती है।
इंदौर की हालिया घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सत्ता में बैठे नेताओं को अपनी भाषा और रवैये पर आत्ममंथन करने की जरूरत है। कैलाश विजयवर्गीय जैसे वरिष्ठ नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संवेदनशील मुद्दों पर संयम और जिम्मेदारी के साथ बात करें।
जब तक बयानबाजी पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक उनके अच्छे काम भी विवादों की धुंध में दबते रहेंगे—और यही शायद उनकी राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।




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