इंदौर के ‘विकास मॉडल’ पर सवाल: भागीरथपुरा में दूषित पानी और मौतों की भयावह कहानी
- Lucky Kumar
- 2 days ago
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घर-घर पहुंच रहा पानी, लेकिन भरोसा नहीं… सिस्टम की चूक ने छीनी कई जिंदगियां
मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर को अक्सर स्वच्छता, विकास और बेहतर बुनियादी ढांचे का मॉडल बताया जाता है। मंचों पर इंदौर की तारीफों के पुल बांधे जाते हैं, पुरस्कारों की झड़ी लगती है और प्रशासन खुद को सफल बताता है। लेकिन इन्हीं दावों के बीच इंदौर के भागीरथपुरा इलाके से आई तस्वीरें और खबरें इस ‘विकास मॉडल’ की सच्चाई पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।
भागीरथपुरा की संकरी गलियों में बिछी पाइपलाइन के जरिए आज भी लोगों के घरों तक पानी पहुंच रहा है, लेकिन यह पानी अब जीवन नहीं, मौत का कारण बनता जा रहा है। कुछ महीने पहले तक जिस इलाके को विकास का उदाहरण बताया जा रहा था, आज वहीं दूषित पानी से फैली बीमारी ने कई परिवारों को उजाड़ दिया है।
पानी पहुंच रहा है, लेकिन भरोसा खत्म हो चुका है
स्थानीय लोगों के मुताबिक, इलाके में सप्लाई होने वाला पानी बदबूदार है, उसका रंग बदला हुआ है और पीने योग्य बिल्कुल नहीं है।लोगों का कहना है कि—
लंबे समय से पानी की गुणवत्ता पर सवाल उठाए जा रहे थे
कई बार शिकायतें की गईं
लेकिन प्रशासन ने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया
नतीजा यह हुआ कि इलाके में डायरिया और पेट से जुड़ी गंभीर बीमारियां फैलने लगीं।
मौतों के आंकड़ों पर भी सवाल
भागीरथपुरा में हुई मौतों को लेकर आंकड़ों की सच्चाई अब सबसे बड़ा विवाद बन चुकी है।
प्रशासन अब तक सिर्फ 6 मौतों की पुष्टि कर रहा है
वहीं इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव मरने वालों की संख्या 10 बता चुके हैं
जबकि स्थानीय लोगों का दावा इससे भी ज्यादा भयावह है
इलाके के निवासियों के अनुसार,
“डायरिया फैलने से कम से कम 16 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें 6 महीने का एक मासूम बच्चा भी शामिल है।”
आंकड़ों में यह फर्क बताता है कि ज़मीनी हकीकत और सरकारी दावों के बीच गहरी खाई है।
छह महीने का मासूम भी नहीं बचा
स्थानीय लोगों के लिए सबसे दर्दनाक घटना एक छह महीने के बच्चे की मौत है।परिजनों का कहना है कि बच्चे की तबीयत अचानक बिगड़ी, उल्टी-दस्त शुरू हुए और कुछ ही घंटों में उसकी मौत हो गई।यह घटना सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता की कहानी है।
सिस्टम पर गंभीर आरोप
भागीरथपुरा के लोगों का आरोप है कि—
पाइपलाइन जर्जर हालत में है
सीवरेज लाइन और पानी की लाइन कई जगह एक-दूसरे के बेहद करीब हैं
बरसात और लीकेज के दौरान गंदा पानी सप्लाई लाइन में मिल गया
इसके बावजूद समय पर न तो पाइपलाइन बदली गई,न ही नियमित पानी की जांच हुई।
मंच पर तालियां, जमीन पर लाशें
इस पूरे मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि—जब इंदौर को विकास का मॉडल बताया जा रहा था,तो उसी शहर के एक हिस्से में लोग दूषित पानी पीकर मर क्यों रहे थे?
आलोचक कहते हैं कि यह कहानी सिर्फ दूषित पानी से हुई मौतों की नहीं है,यह कहानी है उस सिस्टम की—जो मंचों पर तालियां बटोरता है,लेकिन ज़मीन पर आम लोगों की ज़िंदगियां सुरक्षित नहीं रख पाता।
प्रशासन की कार्रवाई और सवाल
मामले के सामने आने के बाद प्रशासन ने—
पानी की सप्लाई अस्थायी रूप से रोकी
टैंकरों से पानी उपलब्ध कराने का दावा किया
जांच के आदेश दिए
लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है किजब तक जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक भरोसा वापस नहीं आएगा।
क्या सीख मिलेगी इस त्रासदी से?
भागीरथपुरा की यह घटना सिर्फ एक इलाके की समस्या नहीं है।यह चेतावनी है कि—
बुनियादी सुविधाओं में लापरवाही
कागज़ी विकास
और ज़मीनी सच्चाई को नज़रअंदाज़ करना
किस तरह जानलेवा साबित हो सकता है।
इंदौर का भागीरथपुरा आज पूछ रहा है—क्या विकास सिर्फ आंकड़ों और पुरस्कारों का नाम है?या फिर उसकी असली कसौटी यह है किहर नागरिक को साफ और सुरक्षित पानी मिल सके?
जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलेगा,तब तक विकास के तमाम दावेदूषित पानी की तरह ही संदेह के घेरे में रहेंगे।




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