शादियों और पार्टियों में खोती पवित्रता पर प्रेमानंद महाराज का संदेश
- Lucky Kumar
- Jan 7
- 3 min read

“भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, वह एक संस्कार था”
आज की आधुनिक जीवनशैली में शादियां और पार्टियां भले ही पहले से ज्यादा भव्य, चमक-दमक से भरपूर और सुविधाओं से सुसज्जित हो गई हों, लेकिन इन सबके बीच पवित्रता और संस्कार धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। शराब के गिलास, दिखावे की थालियां और औपचारिक व्यवहार के बीच न आचरण की शुद्धता बची है, न विचारों की निर्मलता।
इसी विषय पर वृंदावन-मथुरा के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज से एक भक्त ने प्रश्न किया कि—“हमें आज की शादियों और पार्टियों में भोजन कैसे करना चाहिए? क्या उसमें शुद्धता का ध्यान रखना जरूरी है?”
इस सवाल के जवाब में प्रेमानंद महाराज ने बेहद सरल लेकिन गहरे अर्थ वाला उत्तर दिया, जो आज के समाज को आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है।
“कलियुग में आचरण और बुद्धि, दोनों अपवित्र हो रहे हैं”
प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि आज की पार्टियों को देखें तो लोग शराब पीकर उसी हाथ से भोजन कर लेते हैं, उसी चम्मच से खाते हैं और फिर बिना किसी संकोच के दूसरों से हाथ भी मिला लेते हैं।उनके अनुसार,
“सब कुछ जैसे अपवित्र होता जा रहा है। यही तो कलियुग का प्रभाव है, जहां न बुद्धि की शुद्धता बची है, न आचरण की पवित्रता।”
महाराज बताते हैं कि भोजन केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक शुद्धता से भी जुड़ा होता है। जब भोजन अपवित्र मन और आचरण के साथ किया जाता है, तो उसका प्रभाव भी वैसा ही होता है।
जब भोजन एक संस्कार हुआ करता था
प्रेमानंद महाराज ने पुराने समय की परंपराओं को याद करते हुए कहा कि पहले भोजन को एक पवित्र संस्कार माना जाता था।
स्वच्छ स्थान पर भोजन कराया जाता था
हाथ-पैर धुलवाए जाते थे
तिलक लगाकर आसन पर बैठाया जाता था
श्रद्धा और शांति के साथ भोजन कराया जाता था
महाराज कहते हैं कि उस समय पवित्रता को श्रेष्ठता की पहचान माना जाता था, न कि कमजोरी या पिछड़ापन।
आज पवित्रता पर हंसी उड़ाई जाती है
संत प्रेमानंद महाराज ने समाज की वर्तमान मानसिकता पर भी चिंता जताई।उन्होंने कहा कि आज अगर कोई व्यक्ति शुद्धता का पालन करे, सरलता से भोजन करे या परंपराओं का सम्मान करे, तो लोग उसका मज़ाक उड़ाने लगते हैं।उसे “पिछड़ा”, “गरीब” या “पुरानी सोच वाला” कह दिया जाता है
जबकि सच्चाई यह है कि
“पहले पवित्रता को ही श्रेष्ठता माना जाता था।”
गांवों की परंपराएं: श्रद्धा और सम्मान का उदाहरण
महाराज ने गांवों की पारंपरिक व्यवस्था को उदाहरण के रूप में सामने रखा।उन्होंने कहा कि पहले गांवों में—
विवाह, उत्सव या मांगलिक कार्यों में
अतिथियों के पैर धुलवाए जाते थे
पवित्र आसन पर बैठाया जाता था
पत्तल में भोजन परोसा जाता था
माताएं मंगल गीत गाती थीं
पंगत में बैठकर श्रद्धा से भोजन कराया जाता था
यह सब केवल दिखावा नहीं, बल्कि संस्कारों की जीवंत अभिव्यक्ति थी।
बदलती सोच, बदलते संस्कार
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।भोजन की पद्धति बदल गई है,सोच बदल गई है,और सबसे ज्यादा— संस्कार कमजोर होते जा रहे हैं।
समय के साथ अधार्मिक प्रवृत्तियां बढ़ती जा रही हैं और पवित्रता धीरे-धीरे हमारे जीवन से दूर होती जा रही है।
आज के समाज के लिए बड़ा संदेश
प्रेमानंद महाराज का यह संदेश केवल भोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे जीवन के आचरण पर लागू होता है।वे हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि—क्या आधुनिकता के नाम पर हम अपने मूल संस्कार खोते जा रहे हैं?और क्या भौतिक सुविधा हमें आत्मिक शुद्धता से दूर ले जा रही है?
आज की पार्टियों और शादियों में भले ही भव्यता बढ़ गई हो, लेकिन अगर पवित्रता, शुद्धता और संस्कार नहीं बचे, तो वह केवल एक औपचारिक आयोजन बनकर रह जाता है।
प्रेमानंद महाराज का संदेश हमें यह याद दिलाता है किभोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि आत्मा को संस्कारित करने का माध्यम भी है।और जब तक हम पवित्रता को अपने जीवन में स्थान नहीं देंगे, तब तक सच्चा आनंद भी अधूरा ही रहेगा।

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